Tuesday, March 27, 2018

तालुकात यही है कि आशिक खुद का हूं रहता हूँ खुद में मगर दुनियां से अलबेला हूं

जो वक़्त गुज़र गया
वो वक़्त दिल के बहुत क़रीब था
हम देख रहे थे आइने में अपना चेहरा
जैसे वो चेहरा किसी का नसीब था ।

लबों से छूकर चराग़ रोशन होते हैं तेरे इंतज़ार में शब में फ़ना होते हैं ....