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Monday, January 9, 2017

ख़त लिखेंगे गरचे मतलब कुछ न हो,
हम तो आशिक़ हैं तुम्हारे नाम के.
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मिर्ज़ा ग़ालिब

Wednesday, June 22, 2016

पिला दे औक से साकी जो मुझसे नफरत है,
पियाला गर नहीं देता न दे, शराब तो दे।
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मिर्जा 'गालिब'
औक - अंजुली
क्यों जल गया न ताब-ए-रुख-ए-यार देखकर,
जलता हूँ अपनी ताकत-ए-दीदार देखकर |
मिर्जा ग़ालिब

Thursday, June 16, 2016

दिल को नियाजे-हसरते-दीदार कर चुके,
देखा तो हममें ताकते-दीदार ही नहीं ।
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मिर्जा गालिब
नियाजे-हसरते-दीदार - दर्शन की इच्छा को भेंट

Tuesday, June 14, 2016

दीदार, वादा, हौसला, साक़ी, निगाह-ए-मस्त,
बज़्म-ए-ख़याल मैकदा-ए-बेख़रोश है.
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मिर्ज़ा ग़ालिब
दीदार = दिखाई देना
बेख़रोश = quite/dead

Monday, May 30, 2016

आशिक़ी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब,
दिल का क्या रंग करूँ ख़ून-ए-जिगर होने तक.
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मिर्ज़ा ग़ालिब

Wednesday, April 6, 2016

रही न ताकते-गुफ्तार और अगर हो भी,
तो किस उम्मीद पै कहिए कि आरजू क्या है?
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मिर्जा 'गालिब'

अब मैं हूँ और मातम-ए-यक शहर-ए-आरज़ू,
तोड़ा जो तू ने आईना तिमसाल दार था.
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मिर्ज़ा ग़ालिब

Tuesday, April 5, 2016

अज़ -मेहर- ता -ब -ज़र्रा दिल -ओ -दिल है आइना
तूती को शश -जिहत से मुक़ाबिल है आइना
~
मिर्ज़ा ग़ालिब

ये ग़ालिब का बहोत बेहतरीन शेर है। ग़ालिब कहते है ईश्वर सर्वव्यापी है । सूरज के किरणों से लेकर कण कण में हर जगह उसके ह्रदय की प्रतिमा है । छः दिशाओं में उसका प्रतिबिम्ब दिखता है जो मनुष्य को उसके होने की हमेशा याद दिलाता है ।
अज़ -मेहर- ता -ब -ज़र्रा= सूर्य से लेकर कण तक ;शश -जिहत = छः दिशाएँ

Tuesday, March 29, 2016

आईना क्यूँ न दूँ  तमाशा कहे जिसे
ऐसा कहाँ से लाऊं की तुझ सा कहे जिसे ।
गालिब ' बुरा न मान जो वाइज़ बुरा कहे
ऐसा भी कोई है की सब अच्छा कहें जिसे ।

Thursday, March 10, 2016

मोहब्बत मे नहीं है फर्क , जीने और मरने का
इसी को देखकर जीतें हैं , जिस काफिर पे दम निकले ।
ग़ालिब

Thursday, February 25, 2016

दिल ही तो है न संग-ओ-खिश्त दर्द से भर न आये क्यों,
रोयेंगे हम हज़ार बार कोई हमें सताए क्यों.
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मिर्ज़ा ग़ालिब
बस कि दुश्वार है हर काम का आसां होना,
आदमी को भी मयस्सर नहीं इन्सां होना.
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मिर्ज़ा ग़ालिब

Wednesday, February 24, 2016

चन्द तस्वीर-ए-बुताँ चन्द हसीनों के ख़तूत,
बाद मरने के मेरे घर से ये सामाँ निकला |

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मिर्ज़ा ग़ालिब
नक्श फ़रियादी है किस की शोख़ी-ए-तहरीर का,
कागज़ी है पैराहन हर पैकर-ए-तस्वीर का |

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मिर्ज़ा ग़ालिब

Sunday, February 21, 2016

लिपटना परनियाँ में शोला-ए-आतिश का आसाँ है,
वले मुश्किल है हिकमत दिल में सोज़-ए-ग़म छुपाने की |
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मिर्ज़ा ग़ालिब
साया मेरा मुझसे मिसल-ए-दूर भागे है 'असद',
पास मुझ आतिशबजाँ-जान के किस से ठहरा जाए है |
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मिर्ज़ा ग़ालिब
दिल मेरा सोज़-ए-निहाँ से बेमुहाबा जल गया,
आतिश-ए-ख़ामोश के मानिंद गोया जल गया.
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मिर्ज़ा ग़ालिब