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Wednesday, April 6, 2016

ये आरज़ू ही रही कोई आरज़ू करते,
ख़ुद अपनी आग में जलते जिगर लहू करते.
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हिमायत अली शायर

Friday, February 19, 2016

अब न कोई मन्ज़िल है और न रहगुज़र कोई,
जाने क़ाफिला भटके अब कहाँ कहाँ यारो.
-हिमायत अली