"दो दिन हो गए हैं...
कलम हाथ में नहीं है,
क्या लिखूं? क्यों लिखूं? समझ नहीं आ रहा।
..."जब दिल में पीड़ा हो
और अनगिनत सवाल भीतर घुमड़ रहे हों,
तो हृदय नहीं मानता कि इधर-उधर की बातें लिखूं।
~"शब्द रूठे पड़े हैं...
काया की पीड़ा लिख भी दूं
तो कौन पढ़ेगा? कौन समझेगा?
मुझे पता है...
इसीलिए!
काया और कलम दोनों अब मौन हैं...
#शांडिल्य