जज़्बातों के पहिए
अब भी गतिशील होना चाहते हैं,
पर समय की कठोर ग्रंथि ने
उनकी धुरी को बाँध दिया है।
मन एक रणभूमि है—
जहाँ इच्छा और कर्तव्य,
लालसा और तर्क,
दोनों अपने-अपने अस्त्र उठाए खड़े हैं।
तुम्हें चुनना—
मानो अपनी ही अंतरात्मा को प्रश्नांकित करना,
क्योंकि हर भाव के पीछे..
संस्कारों का प्रहरी खड़ा है।
और मैं?
मैं वही कर्ण हूँ—
जिसकी चेतना वचनबद्ध है,
पर हृदय अब भी उस निषिद्ध तृष्णा से ग्रसित है
जिसे पाने का स्वप्न ही एक अपराध लगता है।
#शांडिल्य