**"ए सुनो...
तुम्हें कभी लगा है,
प्रेम सिर्फ भावना नहीं—
वह तो अस्तित्व की व्याख्या है?
"तुम वह शून्य हो,
जहाँ शब्द समाप्त होते हैं और
मौन अपनी पराकाष्ठा पर पहुँचता है।
तुम्हारी दृष्टि...
मानो उपनिषदों की अनंत पहेलियाँ,
जिन्हें सुलझाने में बुद्धि भी संन्यास ले ले।
तुम्हारी मुस्कान—
जैसे वेदांत का वह मंत्र,
जो दुख की जड़ तक पहुँचकर
मुक्ति का आलोक जगा दे।
और तुम्हारे अधर...
स्मरण मात्र से ही
मेरा चित्त समाधि में डूब जाता है।
तुम स्वप्न नहीं,
तुम वह ब्रह्म-सत्य हो,
जिसे मेरी प्रत्येक प्राणवायु
श्रद्धया स्वीकार करती है।
ए सुनो...
यदि तुम मेरी निस्तब्धता
पढ़ सको,तो जानोगी—
मैं सिर्फ प्रेम नहीं करता,
मैं तुम्हारे होने के कारण
अपने होने का अर्थ समझता हूँ।
#शांडिल्य