मेरे शब्दों के आँगन में,
एक दुल्हन सजी है—
जो न किसी की साँझा है,
न कहीं और की परछाई।
ये दुल्हन...
मेरे मन की एकांत स्मृतियों में बसती है।
मेरे लफ़्ज़ों के कंगन,
मेरे ख़यालों की चुनरी ओढ़े—
मैं लिखता हूँ तो वो मुस्कुराती है।
हाँ...
मेरी लेखनी ही मेरी दुल्हन है।"
#शांडिल्य