हर बात का हिसाब लिए जा रहा है वक्त,
ख़ामोश है मगर ये जिए जा रहा है वक्त।
ठहरा नहीं कभी किसी रहगीर के लिए,
आँखों के सामने से बहे जा रहा है वक्त।
ज़ख़्मों पे इक मुसाफ़िर की मानिंद चुपके से,
मरहम भी ख़ुद ही अपने धरे जा रहा है वक्त।
पहचानता नहीं है अमीरी-ग़रीबी को,
सबके नसीब तय ही किए जा रहा है वक्त।
कल क्या था, आज क्या है, ख़बर तक नहीं मिली,
किस मोड़ पर हमें ये लिए जा रहा है वक्त।
#शांडिल्य