हवाओं के हाथों में हारे पत्ते हैं,
किसी शाख़ से टूटे, बेचारे पत्ते हैं।
कभी धूप ने छाँव छीनी, कभी रात ने,
बहुत दर्द दिल में सँवारे पत्ते हैं।
जिन्हें घर समझकर ठहरना था शायद,
वही उम्र भर के किनारे पत्ते हैं।
कोई पूछता है कहाँ जा रहे हो,
कहें क्या—कि ख़ुद से भी हारे पत्ते हैं।
हमें भी तो दुनिया ने यूँ ही बिखेरा,
कि अब ख़ुद हमें ही न प्यारे पत्ते हैं।
‘शांडिल्य’ पूछता है, कहाँ घर हमारा,
हवाओं ने जब से पुकारे पत्ते हैं।