—ए सुनो....🫀
"तुम्हारा पहला स्पर्श..
~जैसे अनंत नीरवता में पहली नाद की तरंग।
उस क्षण मेरे भीतर का हर शून्य भर गया—
ना शरीर ने जाना, ना इंद्रियों ने,
पर आत्मा ने एक अनाम बंधन में खुद को बाँध लिया।
क्योंकि"~
प्रेम स्पर्श का विषय नहीं है,
वह चेतना की गोद में पलने वाला नाद है।
देह की सीमाएं "जहाँ समाप्त होती हैं,
वहाँ यह बंधन अपनी अनंत जड़ें जमाता है।
और तब समझ आया—
तू मुझसे अलग नहीं,
तू मेरी हर श्वास का अप्रकट स्वर है,
जिसे न वियोग तोड़ सकता है, न मृत्यु।
क्योंकि यह प्रेम देह का नहीं, अमृत चेतना का संधान है।
#शांडिल्य