पतझड़ ने फिर शाख़ का श्रृंगार ले लिया,
मौसम ने हँसते फूलों का प्यार ले लिया।
गिरते हुए पत्तों ने इतना सिखा दिया,
हर हार ने जीने का अधिकार ले लिया।
सूनी-सी राह में भी उम्मीद चल पड़ी,
बसंत ने दिल में फिर से घर कर लिया।
कल फिर नई कोंपलें मुस्कुराएँगी यक़ीनन,
कुदरत ने हर पतझड़ में बहार भर दिया।
#शांडिल्य