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Thursday, November 3, 2016

क़ासिद के आते आते ख़त इक और लिख रखूँ,
मैं जानता हूँ वो जो लिखेंगे जवाब में.

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मिर्ज़ा ग़ालिब

Wednesday, October 12, 2016

ये न थी हमारी किस्मत कि विसाल-ए-यार होता,
अगर और जीते रहते यही इन्तज़ार होता |

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मिर्ज़ा ग़ालिब

Monday, August 29, 2016

मुद्दत हुई है यार को मेहमां किये हुए,
जोशे-कदह से बज्मे-चरागाँ किये हुए।
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मिर्जा गालिब

1.
कदह - शराब पीने का जाम,
2.
बज्मे-चरागाँ - महफिल को चरागों से रौशन करना
क्यूँ गर्दिश-ए-मुदाम से घबरा न जाए दिल,
इन्सान हूँ पियाला-ओ-साग़र नहीं हूँ मैं |

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मिर्ज़ा ग़ालिब

आज हम अपनी परेशानी-ए-खातिर उन से,
कहने जाते तो हैं, पर देखिये क्या कहते हैं.

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मिर्ज़ा ग़ालिब