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Wednesday, January 18, 2017

वो परिंदा जिसे अपनी परवाज़ से फुर्सत न थी फ़राज़
आज तनहा हुआ तो मेरी ही दीवार पे आ बैठा....

Monday, January 9, 2017

ये मासूमियत का कोन सा अंदाज़ है फ़राज़....
पैर काट के कहने लगे अब तुम आज़ाद हो...

- फ़राज़

Thursday, October 20, 2016

ख़ुद अपने आप को परखा तो ये नदामत है,
कि अब कभी उसे इल्ज़ाम-ए-बेवफ़ाई न दूँ.
-
अहमद फ़राज़
नदामत = shame

Wednesday, October 12, 2016

आ के अब तस्लीम कर लें तू नहीं तो मैं सही,
कौन मानेगा के हम में बेवफ़ा कोई नहीं.
-
अहमद फ़राज़

Wednesday, August 10, 2016

मैं तो आवारा शायर हूँ मेरी क्या वक़ात,
एक दो गीत परेशान से गा लेता हूँ. |

-
अहमद फ़राज़

Thursday, May 5, 2016

अब क्यों न ज़िंदगी पे मुहब्बत को वार दें,
इस आशिक़ी में जान से जाना बहुत हुआ.
-
अहमद फ़राज़

Thursday, March 24, 2016

कुछ मुहब्बत का नशा था पहले हम को फराज़;
दिल जो टूटा नशे से मुहब्बत हो गयी.
कब मुझ को ऐतेराफ़-ए-मुहब्बत न था ’फ़राज़’
कब मैं ने ये कहा था सज़ायें मुझे न दो
और ’फ़राज़’ चाहीये कितनी मुहब्बतें तुझे
के माओं ने तेरे नाम पर बच्चों के नाम रख दिया
मुब्बत की राह में दो हैं मंजिलें "फ़राज़"
या दिल में उतर जाना या दिल से उतर जाना.........
बहुत अज़ीब हैं ये बंदिशें मोहबबत की "फराज़"
न उसने कैद में रखा, न हम फरार हुए....

Wednesday, March 23, 2016

मोहब्बत की परस्तिश के लिये एक रात ही काफी है 'फराज़'
सुबह तक जो ज़िन्दा रह जाये वो परवाना नहीं होता ।

ऐसा नहीं कि उन से मोहब्बत नहीं रही,
जज़्बात में वो पहली सी शिद्दत नहीं रही.
मोहब्बत की परस्तिश के लिये एक रात ही काफी है 'फराज़'
सुबह तक जो ज़िन्दा रह जाये वो परवाना नहीं होता ।

Thursday, March 10, 2016

कितना अजीब है लोगों का अंदाज़ -ए-मोहब्बत 'फराज'
रोज एक नया जख्म देकर कहते हैं " अपना ख्याल रखना " ।
मोहब्बत के अंदाज़ जुदा जुदा हैं 'फ़राज़'...
किसी ने टूट कर चाह और कोई चाह कर टूट गया..
मोहब्बत के बाद मोहब्बत मुमकिन है फ़राज़.....!!!!
मगर टूट के चाहना सिर्फ एक बार होता है....

Tuesday, March 8, 2016

मोहब्बत तो वो पहली ही मोहब्बत थी फराज़
इसके बाद तो हर शक्स में ढूँढा उस को
--
अहमद फराज़
काफिर हुए थे जिसकी मोहब्बत में हम फराज़
कल वही शख्स किसी और के लिए मुसलमान हो गया
--
अहमद फराज़

Thursday, February 18, 2016

ऐसे चुप हैं के ये मन्ज़िल भी कड़ी हो जैसे,
तेरा मिलना भी जुदाई की घड़ी हो जैसे |
-अहमद फ़राज़