Monday, October 6, 2014

सुबह को सूरज ने झांका, रोशनी अच्छी लगी
शब् को अपनी छत पे बैठी, चांदनी अच्छी लगी

खेत की मेड़ों पे पायल-गीत, लगता है भला
गाँव की गलियों में फिरती, रागिनी अच्छी लगी

दिल में हो नफ़रत ओत दिन भी रात की मानिंद
हो मुहब्बत की किरण, तो रात भी अच्छी लगी

यूं तो सब कहते हैं, ये हैवानियत का दौर है
आदमी की आदमियत आज भी अच्छी लगी

भूख क्या ? आते में जब डाला है मेहनत का नमक
रूखी सूखी जैसी भी रोटी बनी, अच्छी लगी

एक बूढ़े पेड़ के साए तले दोस्तो हमें
दूसरों को छाँव देती ज़िन्दगी, अच्छी लगी

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