Thursday, June 4, 2015

मोहब्बत से इनायत से वफ़ा से चोट लगती है
बिखरता फूल हूँ मुझको हवा से चोट लगती है

मैं शबनम की ज़बान से , फूल की आवाज़ सुनाता हूँ
अजीब एहसास है अपनी सदा से चोट लगती है

मेरी आँखों मैं आंसू की तरह इक रात आ जाओ
तकल्लुफ़ से बनावट से अदा से चोट लगती है

तुझे खुद अपनी मजबूरी का अंदाजा नहीं शायाद
ना कर अहेद -ए -वफ़ा अहेद -ए -वफ़ा से चोट लगती है ..

द्वारा-फिरोज अल्लापुर



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