जीवन के सफर में
मैं_और_तुम
साथ चले
चलते गए
कई बार
उलझे और उलझते गए
कई बार गिरे और संभलते भी गए
अब एक
स्थिरता है
तेरे मेरे दरमियां
ना रूठना मनाना
ना झगड़ा सुलह
ना रीझाने का है कोई शौक
यंत्रवत
रोज सी जिंदगी
ना तुम शिकवे करते हो,ना कोई शिकायत
हम कब से
इंसान से मशीन बन चुके हैं
---- सुनिल #शांडिल्य
No comments:
Post a Comment