निकल कर आंखों से बाहर देखा
मैंने देह छोड के रुह के भीतर देखा
हाँ मैंने उसे आज नगे पैर चलते देखा
उसके रूप के रंग को आज
जिम्मेदारी की मे धुप पिघलते देखा
एक छोटी सी बिंदी माथे पे
सादी सी साड़ी में पैदल चलते देखा
थोड़ी सी आशा थोड़ी सी चिंता
मन ही मन में समुद्र मंथन करते देखा
उस अकेली को समस्त जग का चिंतन करते देखा
हाँ मैंने पहली दफा सत्य की सुंदरता को उजागर
होते देखा है
~~~~ सुनिल #शांडिल्य
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