मुहब्बत निभाने के, दिन आ रहे हैं,
सनम पास आने के, दिन आ रहें हैं।
सफ़र आपसे है, हमारा मुक़म्मल,
कि वादे निभाने के, दिन आ रहें हैं।
बड़ा ख़ूबसूरत समाँ, आजकल का,
दिलों की सुनाने के, दिन आ रहें हैं।
सनम हुस्न पर, तुम न इतराओ इतना,
ये घूँघट हटाने के, दिन आ रहें हैं।
दिलो जान से हमने, चाहा है तुमको,
यही अब बताने के, दिन आ रहें हैं।
चुराओ न हमसे, नज़र अब तो जानम,
निगाहें_मिलाने के, दिन आ रहें हैं।
भला इतना, ग़ुमां क्यूँ है उनको,
उन्हें आज़माने के, दिन आ रहें हैं।
~~~~ सुनिल #शांडिल्य
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