Sunday, August 25, 2024

मुहब्बत निभाने के, दिन आ रहे हैं,
सनम पास आने के, दिन आ रहें हैं।

सफ़र आपसे है, हमारा मुक़म्मल,
कि वादे निभाने के, दिन आ रहें हैं।

बड़ा ख़ूबसूरत समाँ, आजकल का,
दिलों की सुनाने के, दिन आ रहें हैं।

सनम हुस्न पर, तुम न इतराओ इतना,
ये घूँघट हटाने के, दिन आ रहें  हैं।

दिलो जान से हमने, चाहा है तुमको,
यही अब बताने के, दिन आ रहें हैं।

चुराओ न हमसे, नज़र अब तो जानम,
निगाहें_मिलाने के, दिन आ रहें हैं।

भला इतना, ग़ुमां क्यूँ है उनको,
उन्हें आज़माने के, दिन आ रहें  हैं।

~~~~ सुनिल #शांडिल्य

No comments:

Post a Comment