Thursday, April 17, 2025

खिली सी रंगत पर,हजारों रंगीन अफ़साने लिखे 
बेगैरत सादगी आ कर क्यों,मौसम बिगाड़ देती है ??

खिली हो धूप-छांव में,तमस में चांदनी का जलवा
खामोशी छेड़ती है राग,नीरव में गजल का मसला

अनजान सी रागिनी आकर,तरन्नुम बिगाड़ देती है
बेगैरत सादगी आ कर क्यों,मौसम बिगाड़ देती है

#शांडिल्य

Saturday, April 5, 2025

कोई ख्वाब जैसे 
पलकों को छूकर जाए
कोई राही जैसे 
अपनी मंजिल से लौट जाए
कोई दरिया जैसे
समंदर में जाकर खो जाए
तुम और मैं ऐसे ही तो हैं
ओस की एक बूँद जैसे
हरे पत्तों की गोद में छुप जाए
कोई किरण जैसे
दूब से लिपटकर चटकीली हो जाए
कोयल की कूक जैसे
तुम और मैं ऐसे ही तो हैं

#शांडिल्य