लौट के वापस आ जाओ मनमीत
ऋतु बसंत में मत दो मुझको
पतझड़ का आभास
दे जाओ सुधियों की ख़ातिर
मृदुल मधुर एहसास
मुझको रचने हैं जुल्फों पे
अधरों पे कुछ गीत
लौट के वापस आ जाओ मनमीत
संग तुम्हारे खिल उठते थे
उपवन के सब फूल
कंकर पत्थर माटी तो क्या
जी उठते थे शूल
#शांडिल्य
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