ख़ामोशी के इस समंदर में,
लफ़्ज़ भी अक्सर डूब जाते हैं।
दर्द की धूप में तपकर ही तो,
हौसलों के साये खिल जाते हैं।
हमने भी सीखा है अब
इन ज़ख़्मों को सलीके से छुपाना…
दिल के भीतर जलती लौ को
मुस्कानों से जगमगाना।
जो मिला नहीं फिर भी अपना लगे,
वो इश्क़ भी क्या अजीब कहानी—
बस ख़्यालों की महफ़िल में ही सही,
दिल की राहों में बसता है वो रूहानी।
#शांडिल्य
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