Tuesday, May 17, 2022

 तेरी इक छुअन की

तमन्ना कबसे पाल रखी


पास आओ की

जज्बात मेरी मचली है


अब मुझको दूर से

यूं न तड़पाओ तुम


रात है शमां है

बहके बहके अरमान हैं


चली पुरवाई 

हुआ बदन सर्द


सीने से लगकर

सांसो से सुलगा दो तुम


शर्म लाज की घुंघट

का परदा हटा अब


की आखिरी सांस तक

तू मुझे जरूरी है !


---- सुनिल #शांडिल्य

Monday, May 16, 2022

 करूं मैं तुझसे इश्क बेइंतेहा

करूं मैं इबादत तेरी


तेरी खुशबू बसी जहन मे मेरी

मेरी धड़कन में रवानगी तेरी


आई मिलन की अद्भुत बेला

बांहों में हो तुम और शमा अलबेला


लबों की लबों से हो रही है गुस्ताखियां

उंगलियो के पोर बदन पे थिरक रहे


आगोश मे बिखर रहे

हौले हौले से सुलग रहे


---- सुनिल #शांडिल्य

Sunday, May 15, 2022

 तेरे सुर्ख गुलाबी

होठों की अब

परिभाषा क्या

कहती है


मनोनीत मन-मानस

की मेरी अब आशा

क्या कहती है


तुम अधजल गगरी

छलको ना यूं

तुम हो बसन्त

की शाख प्रिये


हो शब्द रहित

तुम चिर अनन्त

तुम हो यौवन की

मधुमास प्रिये

देख तुम्हारी

कंचन-काया


तुमको अदभुत

मेरी जिज्ञासा

ये कहती है!


---- सुनिल #शांडिल्य

Tuesday, May 10, 2022

 जो तेरी पायल की मैं

खनकती रून झुन सुन लूं


कसम से मैं संगीत को

सुनना ही छोड़ दूं


जो तेरा चांद सा चेहरा 

मेरे  हाथों में आ  जाए


कसम से मैं आसमां के

चांद को देखना ही छोड़ दूं


मेरी मोहब्बत की सारी

आरजू पूरी हो जाए


जो तेरे सीने पे मैं सर 

रखकर धड़कन सुन लूं


---- सुनिल #शांडिल्य

Wednesday, May 4, 2022

 मैं लिखूं  जब भी कोई नज़्म

तुम उन  नज्मों में बस जाना


मैं लिखूं जब भी कोई कविता

तुम उनमें अहसास बन जाना


नजरों  में  इतना  नेह रखना

पलकों  पे  महसूस  तुम होना


राह  मेरी  तेरी ओर  ही जाए

ऐसी डोर  में  तुम बांध  लेना


रहना भले ही तुम दूर मुझसे

जब सोचूं तो पास चली आना !


---- सुनिल #शांडिल्य

Tuesday, May 3, 2022

 कुछ शब्द मैं मेरी

यादों से चुराता हूं


उस हसीं मन्ज़र को

कागज पर उतारता हूं


तेरी आँखो को पढता हूं

प्रेम की परिभाषा लिखता हूं


अल्फाज़ो मे बयां कर दूं

मैं तुझे कितना चाहता हूँ


पास जब आती हो तुम

शब्द मेरे नि:शब्द हो जाते हैं


चाहता हूं अपनी सारी

कविताएं तेरे नाम कर दूँ


---- सुनिल #शांडिल्य

Sunday, May 1, 2022

 ओढ़ जो लेती हो

तुम मुझे ..


बिखर जाता हूं मैं

तेरी आगोश में ..


सांसों की हरारत 

पिघलाती मुझे


उंगलियों की शरारत 

से सिहर उठता हूं


कानों में मिश्री घोलती

तेरी फुसफुसाहट ..


जाने किस लोक में

सैर को निकल जाता हूं


तुम बन जाती हो चांद

और मैं तुम्हें निहारता रहता हूं !


---- सुनिल #शांडिल्य