Thursday, July 7, 2022

 बेइंतेहा दर्द है छुपाना चाहता

पर मुझे छुपाना भी नही आता


बहुत कुछ है लिखने को

पर थोड़ा बहुत ही लिख पाता


आंखें डबडबाई हुई रहती

चेहरा मुस्कुराता हुआ रहता


उंगलियां दिल के अहसास

कलम से पन्नों पे बिखेर जाता


पोंछ लेता हूं मैं नम आंखें ..

पर कागज़ पे दर्द छलक जाता ।।


---- सुनिल #शांडिल्य

Wednesday, July 6, 2022

 महसूस होती हो

तुम मुझे मेरे आसपास

जब भी मैं खोता हूं

ख्यालों में तुम्हारे


इस अहसास को

क्या नाम दूं?

क्या यही प्रेम है?


आह,

मुझे तुमसे प्रेम है

सुन रही हो ना


"अगाध प्रेम"


अब तुम अपने 

दिल पे हाथ रखो

देखो तुम्हारी धड़कन भी

मेरा नाम गुनगुनाती है ?


मेरी धड़कन ..


---- सुनिल #शांडिल्य

Tuesday, July 5, 2022

 कितनी नज़्में

लिखी होंगी मैने


कितनी कविताएं

लिखी होंगी मैने


कभी प्रेम में

कभी दर्द में


जो दर्शाती है

मेरे दिल का हाल


"प्रेम"

मेरे लिए एक

छलावा ही रहा


हर किसी ने खेला

मेरे जज्बात से


फ़िर भी किसी से

कोई गिला नहीं मुझे


खुद को ही कसूरवार ठहराया

कुछ तो कमी होगी मुझमे ही ..


---- सुनिल #शांडिल्य

Monday, July 4, 2022

 बेबसी में तड़पकर रह जाता हूँ

अक्सर ख्वाब दिल में सजाता हूँ 


चाहे कोई समझे ना समझे मुझे

तुम मुझे समझो ये आस लगाता हूँ


जख्म देती हो जब जब तुम मुझे

अपने जख्म खुद ही सहलाता हूँ


करती हो मुझे तोड़ने की कोशिश

टूट कर फिर भी मैं मुस्कुराता हूं


बस तुम्हारी खुशी की दुआ करता हूं ..


---- सुनिल #शांडिल्य

Sunday, July 3, 2022

 मैं कोई रिश्ता नहीं हूँ

जो तुम निभाओगी मुझे ..


मैं तो बस अदना सा इश्क़ हूँ

तुम इश्क़ से ही पाओगी मुझे ..


है मेरी इक आखिरी ख्वाहिश

तुम पूरी करोगी क्या ?.


जब जनाजा मेरा निकलेगा

क्या कफ़न में अपना दुपट्टा ओढ़ाओगी मुझे ?.


---- सुनिल #शांडिल्य

Saturday, July 2, 2022

 ख्वाबों ख्यालों में तुम आ रही हो

राफ्ता राफ्ता दिल में समा रही हो,


दीदार कर तेरा ,मुझे सुकून आता है

इस कदर तुम,मुझसे मुझे चुरा रही हो,


चांद भी आज मद्धम पड़ गया है

तुम घुंघट से जो झांक रही हो,


तेरी सांसों से महकने लगा हूं मैं अब

तुम मेरे आगोश में जो बिखर रही हो ।।


---- सुनिल #शांडिल्य

Friday, July 1, 2022

 जिंदगी और मेरे बीच गजब की जंग है ;

रोज इससे खेलता हूं पीछा छुड़ाना चाहता हूं; 


जाने क्या क्या कर जाता हूं..

जिंदगी के अंतिम छोर पे जाकर लौट आता हूं..

तरह तरह के एडवेंचर करता हूं.. 


कभी कभी लगता है की 

अब जिंदगी से पीछा छूटने ही वाला है, 

की ये कमबख्त फिर मुझे दबोच लेती है ..


अपनी जिंदगी को कहता हूं,

बोल कितने पल का मेहमान हूं ?, 

फिर आंखें खोल देता हूं,


जिंदा हूं मैं अब भी 

सहसा येअहसास हो जाता है,

ओह फिर से जीत गई.."जिंदगी"


ना किसी से कोई गिला ना शिकवा ..

जिसने जो दिया मेरे हिस्से का था 

वो प्रेम भी, नफरत भी, धोखा भी,


खैर .. 

यात्रा जारी है ...  

अनवरत ..

जिंदगी तू कभी तो हारेगी ही ..

कभी तो मैं जीतूंगा ही ..


---- सुनिल #शांडिल्य