रोना-हँसना, लड़ना-झगड़ना
बन कर आज बरगद की छाँव
देती है मुझे एक सुखद ठाँव।
सुख का यह क्षण लिए आ जाती हो
जब तुम दबे पाँव बहुत पास लगता है
तुम्हारी यादों का
गाँव।
ऐसे ही आती रहो तुम
मेरे मन मस्तिष्क में
अविरल-अविराम।
कसम तुम्हारी मरते दम तक
मैं तुम्हारा इंतजार
करूँगा,
जीने के लिए जब भी...
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