केवल यूँ हीं स्वीकार नहीं
इस एक धरोहर के सम्मुख,
जँचता कोई उपहार नहीं
तेरे गीतों को गाने से,
यह हदय कमल खिल जाते हैं
तन्हाई की परछाईं में,
हमतुम दोनों मिलजाते हैं
बातें होती हैं नयनों से,
जब अधर-अधर सिल जाते हैं
यह विरह-मिलन का महाकुंभ,
अब समझेगा संसार नहीं
#शांडिल्य
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