Monday, August 11, 2025

बस यूँ ही गुज़र रहा है जो
वो सफर हूँ मैं
मंज़िल से होकर बेख़बर 
भटक रहा हूँ मैं
ग़र मुलाक़ात हो तो बताना
तलाश रहा हूँ मैं
साँसें उखड़ने लगीं हैं अब
यादें भी धुंधली पड़ने लगी हैं 
किस्मत अपनी बनाने को 
अब भी लड़ रहा हूँ मैं।

#शांडिल्य

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