Monday, September 1, 2025

उमड़ घुमड़ कर अंतर्मन में
बन जाऊं उत्साह उमंग
कामनाओं की शुभता से
भरूं खुशियों के नवरंग

दृष्टि के आलोक में सदा
शीर्षक बन सामने आऊं
गीत के भव्य छंद सजाकर
स्वरों का लय बन गाऊं

मुस्कान बन संप्रेषण की
बनूं संवाद की प्रेरक भाषा
अभिव्यक्ति का सेतु बनना ही
है मेरे जीवन की अभिलाषा

#शांडिल्य

No comments:

Post a Comment