Friday, September 12, 2025

कभी-कभी शाम 
ऐसे भी ढ़लती है
जैसे किसी दुल्हन का
घूंघट उतर रहा हो
हौले हौले झांक रही 
कजरारी अँखियां
शरमाई हुई
सीने से उठ रहा है
प्यार का खुमार 
धीरे धीरे
वही ख्वाब की रात है
रास्ते भी वही
इंतज़ार में सिमटी
हुई शाम है
ये सफर है मेरे इश्क़ का
न दयार है न क़याम है

#शांडिल्य

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