Monday, September 22, 2025

ख़्वाब टूटे कुछ यू जैसे हरे पत्ते टूटे हों साखों से
और देखते देखते हार गया समंदर इन आँखों से

तुम्हें कुछ सुनना नहीं था इसीलिए मैंने कहा नहीं
क्यूँकि मुझे तुमसे कुछ कहना था ना की लाखों से

पूर्णमासी ने जब मन बना ही लिया अमावस्या का
फिर शिकायत क्या और क्यूँ करें अँधेरी पाखों से

#शांडिल्य

No comments:

Post a Comment