ख़्वाब टूटे कुछ यू जैसे हरे पत्ते टूटे हों साखों से
और देखते देखते हार गया समंदर इन आँखों से
तुम्हें कुछ सुनना नहीं था इसीलिए मैंने कहा नहीं
क्यूँकि मुझे तुमसे कुछ कहना था ना की लाखों से
पूर्णमासी ने जब मन बना ही लिया अमावस्या का
फिर शिकायत क्या और क्यूँ करें अँधेरी पाखों से
#शांडिल्य
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