राधा! तुम-सी तुम्हीं एक हो,नहीं कहीं भी उपमा और
लहराता अत्यन्त सुधा-रस-सागर,जिसका ओर न छोर
मैं नित रहता डूबा उसमें,नहीं कभी ऊपर आता
कभी तुम्हारी ही इच्छा से हूँ लहरों में लहराता॥
सदा, सदा मैं सदा तुम्हारा,नहीं कदा कोई भी अन्य
कहीं जरा भी कर पाता अधिकार दास पर सदा अनन्य
#शांडिल्य
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