Sunday, October 12, 2025
बस यूँ ही गुज़र रहा है जो
वो सफर हूँ मैं
मंज़िल से होकर बेख़बर
भटक रहा हूँ मैं
ग़र मुलाक़ात हो तो बताना
तलाश रहा हूँ मैं
साँसें उखड़ने लगीं हैं अब
यादें भी धुंधली पड़ने लगी हैं
किस्मत अपनी बनाने को
अब भी लड़ रहा हूँ मैं।
#शांडिल्य
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