Saturday, October 4, 2025

नारी को जान सका कोई न
न कोई पर्वत न कोई सागर
जीवन जीती है धरती सा
मन हो जाये गागर में सागर

अगनित मोती छुपे हुये है
मनकी बहती नदिया में
है किसको फुरसत देखे जो
वक्त के बहते दरिया में

बनती माला जुड़ जुड़ मोती
ढ़ूंढ़ लाता मन डुबकी लगाकर
जीवन जीती है धरती सा
मन हुआ गागर में सागर

#शांडिल्य

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