लय लोच लचकती स्वर लहरी
नीलिमा नयन में थी गहरी
सागर तट व्याकुल हुए किंतु
लहरें कब तट पर आ ठहरीं
हैं सिंधु किनारे मौन सतत
रत्नाकर होता नहीं पृथक
पर सीप कभी मोती लेकर
तटबंधों तक ना आए चहक
श्रम साहस की जो अमरबेल
लेते वे नर दरिया उढ़ेल
और तोड़ प्रखर भंवरजाल
रत्नों से खेलें प्रबल खेल
#शांडिल्य
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