न आतिश है,न कोई धुआं है,
फिर भी क्यों झुलस रहा हूँ।
ज़िंदगी लाख बचाया फिर भी,
तुझसे क्यों कर उलझ रहा हूँ।
न तो मोम थी न धागा कोई,
पर कतरा कतरा पिघल रहा हूँ।
उधेड़बुन के शौक से,ये हश्र हुआ,
तार तार हो के बस उधड़ रहा हूँ।
मीलों चला मंज़िल तेरी तलाश में,
पहुंचा नहीं बस,घिसड़ रहा हूँ।
ज़िंदगी तुझे समझने की कोशिश में,
लम्हा लम्हा ही,बिखर रहा हूँ।
छुई मुई सा वज़ूद है मेरा,
मत उठा उँगली मेरी ज़ानिब,
ख़ुद ही अपनी हया में,सिकुड़ रहा हूँ,
#शांडिल्य
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