सुनो ना....
वो मेरे अंदर जगह बना रही है ऐसे
लहराती नदी सागर में सिमट रही है जैसे
मेरी कलम, अब मेरी ही बात मानती नहीं
मेरे अल्फाज सिर्फ उसके लिए ही लिखते हों जैसे
मैं उस शोख महबूबा की आँखों में नहीं देख पाता
मुझे लगता है, मैं उनमें ही डूब कर कही खो जाऊंगा जैसे
#शांडिल्य
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