Friday, March 13, 2026

ओये सुनो ...
यह 'अनंत ब्रह्मांड' का आलिंगन भी
तुमसे मिलन की आस में तपता है—

दिन की उजली करनें,
दोपहर की धधकती प्रार्थनाएँ, 
रात की समाधि-सी ख़ामोशी तक 
तेरा नाम मंत्रवत जपती हैं।

मेरे द्वार की चौखट पर
हल्दी-कुमकुम से अंकित स्वस्तिक
अब भी अधूरी है—

तुम्हारी हथेलियों की आभा
और उस दिव्य लम्स के बिना...
और वो आँगन...

तुलसी की मंजरियाँ रोज़ प्रश्न करती हैं—
कब बरसेगा तेरे चरण-स्पर्श का अमृत,
जिससे यह मृतप्राय मिट्टी 
फिर से प्राण-शक्ति से उद्भासित हो सके...।  

#शांडिल्य

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