Tuesday, September 1, 2026

कशिश है कयामत है शामत है तिरी शर्मीली आँखो मे
की मचल जाती है जान-ए-तलब तिरी नीली आँखो मे

बहकने को बहुत है बहाने जाँ-ए-जिगर तिरी साँसो मे
मगर ठहर जाता हूँ सुबहो शाम तिरी नशीली आँखो मे

डूब जाने की परवाह  किसे है जानिब सफर है इश्क मे
मगर हम तो तैरते रहते है शीशे सी चमकीली आँखो मे

#शांडिल्य