Friday, February 19, 2016

अब न कोई मन्ज़िल है और न रहगुज़र कोई,
जाने क़ाफिला भटके अब कहाँ कहाँ यारो.
-हिमायत अली
ये क्या उठाये क़दम और आ गई मन्ज़िल,
मज़ा तो जब है कि पैरों में कुछ थकन रहे.
-राहत इन्दौरी
मुझे सहल हो गईं मंज़िलें वो हवा के रुख़ भी बदल गए,
तेरा हाथ हाथ में आ गया कि चिराग़ राह में जल गए.
-मजरूह सुल्तानपुरी

सहल - सरल ,आसान
क्या हुआ हुस्न हमसफ़र है या नहीं,
इश्क़ मन्ज़िल ही मन्ज़िल है रास्ता नहीं |
-ख़ुमार बाराबंकवी
उल्फत की नई मंज़िल को चला, तू बाँहें डाल के बाँहों में,
दिल तोड़ने वाले देख के चल, हम भी तो पड़े हैं राहों में.
-क़तील शिफाई
मन्ज़िल-ए-जानाँ को जब ये दिल रवाँ था दोस्तों,
तुम को मैं कैसे बताऊँ क्या समाँ था दोस्तों.
-जगन्नाथ आज़ाद
दूर है मन्ज़िल राहें मुश्किल आलम है तन्हाई का,
आज मुझे एहसास हुआ है अपनी शिकस्तापाई का |
-शकील बदायुनी