Tuesday, March 1, 2016

फूल चुनना भी अबस, सैरे-बहारां भी अबस,
दिल का दामन ही जो कांटों से बचाया न गया।
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मुईन अहसन 'जज्बी'

फकत एहसासे-आजादी ही से आजादी इबारत है,
वही घर की दीवार है, वही दीवार, ज़िन्दां की
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सीमाब अकबराबादी

दिल को बर्बाद किये जाती है गम बदस्तूर किये जाती है,
मर चुकीं सारी उम्मीदें, आरजू है कि जिये जाती है।
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असर' लखनवी

गुलों के साये में अक्सर 'रियाज' तड़पा हूँ,
करार कांटों पै कुछ ऐसा पा लियां मैंने।
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रियाज श्यामनगरी

किसी चमन में बस इस खौफ से गुजर न हुआ
किसी कली पै न भूले से पाँव धर जाऊं।
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नदीम कासिमी

कहाँ दूर हट के जायें, हम दिल की सरजमीं से,
दोनों जहां की सैरें, हासिल है सब यहीं से।
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जिगर मुरादाबादी

आँख उठाकर भी न देखूँ, जिससे मेरा दिल न मिले,
रस्मन सबसे हाथ मिलाना, मेरे बस की बात नहीं।