आंखों को बचाये थे हम
अश्के-शिकायत से, साकी के तबस्सुम ने छलका दिया पैमाना ।
Saturday, June 4, 2016
पत्थर के खुदा, पत्थर के सनम
पत्थर ही के इंसान पाए हैं तुम शहर-ए-मुहब्बत कहते हो, हम जान बचा के आये हैं हम सोच रहे थे मुद्दत से, अब उमर गुजारें भी तो कहाँ, सहरा में खुशी के फूल नहीं, शहरों में ग़मों के साए हैं।
फिर आज कोई गजल तेरे नाम न हो जाए कहीं लिखते लिखते शाम न हो जाए ! कर रहे हैं इंतज़ार तेरी मुहब्बत का
!! इस इंतज़ार में जिंदगी तमाम न हो जाए !
प्यार है हमको आपसे इस कद्र! जागते है इंतज़ार में अब तो हर पहर! आपके दीदार से होती है हर सहर! और आपके खुमार में उठती है प्यार की लहर!
Thursday, June 2, 2016
फासले मिटा कर आपस में प्यार रखना; दोस्ती का ये रिश्ता हमेशा बरकरार रखना; बिछड़ जाए कभी आपसे हम; आँखों में हमेशा हमारा इंतज़ार रखना!
मेरी नज़रों में जो खुमार है उसका ही है; मेरे तस्सवुर में जो हिसार है उसका ही है; वो मेरे पास आये, साथ चले रहे न रहे; मुझे तो बस अब इंतज़ार उसका ही है!
तड़प के देखो किसी की चाहत में; तो पता चले कि इंतज़ार क्या होता है; यूँ ही मिल जाये अगर कोई बिना तड़पे; तो कैसे पता चले के प्यार क्या होता है!