Tuesday, June 14, 2016

इश्क का सर-ए-निहां जां-तपन है जिस से
आज इकरार करें और तपिस मिट जाए
हर्फ़-ए-हक़ दिल में खटकता है जो कांटे की तरह
आज इज़हार करें और खलिश मिट जाए
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फैज़ अहमद फैज़
बनायें क्या समझकर शाख़ेगुल पर आशियाँ अपना ?
चमन में आह ! क्या रहना, जो हो बे-आबरू रहना ?
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इक़बाल
चाहता हूँ तेरा दीदार मयस्सर हो जाये,
सोचता हूँ मुझे ताबे-नजर भी होगी ?
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तालिब देहलवी
1.
दीदार - दर्शन
2.
मयस्सर - प्राप्त
3.
ताबे-नजर - देखने की शक्ति
उम्मीदवार वादा-ए-दीदार मर चले,
आते ही आते यारों क़यामत को क्या हुआ.
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मीर तकि मीर
दीदार, वादा, हौसला, साक़ी, निगाह-ए-मस्त,
बज़्म-ए-ख़याल मैकदा-ए-बेख़रोश है.
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मिर्ज़ा ग़ालिब
दीदार = दिखाई देना
बेख़रोश = quite/dead

Wednesday, June 8, 2016

मैं लडखडा रहा हूँ तुझे देख देख कर
तूने तो मेरे सामने एक जाम रख दिया
कितना सितम-ज़रीफ़ है वो साहिब-ए-ज़माल
उसने दिया जला के लब-ए-बाम रख दिया

''हुस्न वालों के चेहरे पर क्या लगती हे आँखे
सीधा रास्ता बना देती हे दिल के आँगन का ''