Wednesday, August 10, 2016
मुझे इंसानियत का दर्द भी बख़शा है कुदरत ने
,
मेरा मक़सद फ़क़त शोलानवाई हो नहीं सकता
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साहिर लुधियानवी
फ़क़त = सिर्फ
शोलानवाई =
raining
मैं तो आवारा शायर हूँ मेरी क्या वक़ात
,
एक दो गीत परेशान से गा लेता हूँ.
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अहमद फ़राज़
चार दिन की ये रफ़ाक़त जो रफ़ाक़त भी नहीं
,
उम्र भर के लिए आज़ार हुई जाती है
,
ज़िन्दगी यूं तो हमेशा से परेशान-सी थी
,
अब तो हर साँस गिराँबार हुई जाती है
|
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साहिर लुधियानवी
न रोना है तरीक़े का न हँसना है सलीक़े का
,
परेशानी में कोई काम जी से हो नहीं सकता.
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दाग़ देहलवी
Monday, August 8, 2016
शायद मुझे शेर आते नही
दोस्त ऐसे मिले जो सुनाते नही
अब मोकाए हालात कुछ ऐसे है
कि शेर शर्मते है दोस्त शर्माते नहीं
वो दूसरों से हँस हँस के मिलते रहे
मेरी ही बद-किस्मती अश्क बहाती रही
हम वफ़ा जिनसे करते रहे उम्र भर
हम पे उनकी जफ़ा मुस्कुराती रही
आज की रात निकलो न तारों ज़रा
आज की रात तनहा गुजारो ज़रा
मेरा किस्मत को तारीक तर छोड़ दो
अपनी आँखों का काजल संवारों जरा
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