Sunday, March 10, 2024

हिम्मतसे बढ़ती है ताकत
एकजुटता से बढ़ती एकता

प्यार बढ़ता साझा करनेसे
परवाह से बढ़ती एकरूपता

छू ना पायेगा कोमल हृदय
किसीके भी कठोर शब्द

छू जाएंगे कठोर हृदयभी
हँसमुख तेरे कोमल शब्द

पढ़ सकते हो तो दर्द पढ़ना
किसीके भी दिलके भीतर

शान्त सा दिखने वाला लगे
कितने दर्द समेट रखे सागर

~~~~~ #$h@πd!£y@

Friday, March 8, 2024

पावस में जब पयस्विनी का रूप निखरता है 
नभ में वह आवारा चन्दा आहें! भरता है ।।

कभी बादलो में छुपता मायूस मलिन सा चेहरा 
कभी निकल कर श्याम घटा से सलिला पर आ ठहरा

कृष्ण-पक्ष में हो विलुप्त मन ऐसे भी तरसाये 
ज्यों भामिन का कंत अचानक परदेशी हो जाये 

शुक्ल पक्ष में नयी कलासंग दिनदिन बढ़ता है
पावस में जब पयस्विनी का रूप निखरता है 
नभमें वह आवारा चन्दा आहें! भरता है

नीरवता में मौन यामिनी युगयुग प्रणय लखी है 
नभ अटखेली देख इंदु की नदिया भी हरषी है 

एक धरापर एकगगन में साथ मचलते हैं 
कलकल करती सरित और शशि दोनों चलते हैं

शुभ्र चाँदनी सी बाहों में सिंधुगामिनी निखरे
जैसे रमणी की मुख आभा साथ पिया के बिखरे 

निर्जन वीरानों में हिमकर साथ गुजरता है। 
पावस में जब पयस्विनी का रूप निखरता है 
नभ में वह आवारा चन्दा आहें! भरता है।।

~~~~ सुनिल #शांडिल्य

Monday, March 4, 2024

तुम्हारेे याद की आहट कोई किस्सा बताती है
ये घुलकर साँस में मेरी नई दुनिया सजाती है

तुम्हारी याद ही शायद है वो दीवार, सूनी सी
जहाँ कुछ अक्स दिखते हैं जहाँ परियाँ नहाती हैं

तुम्हारी याद की ख़ुशबू से मेरी आरज़ू महके
महकती है मेरी धड़कन, ये धड़कन भी सुनाती है

~~~~ सुनिल #शांडिल्य

Saturday, March 2, 2024

दीपक जले भवन में, रहे पतंगा बन में
प्रीत खिच कर लायी उसे जलाया क्षण मैं

जलन का उसे कहाँ था होश
प्यार का चढ़ा हुआ था जोश

गा रही दुनियाँ जिसके गीत
बाँवरे यही प्रीत की रीत

~~~~ सुनिल #शांडिल्य

Thursday, February 29, 2024

यूँ ना जाओ हमें छोड़ कर,
मर जाएंगे अकेले दम तोड़ कर।

क्यों हो यूँ तुम खफा मै ना जानता,
दूरी  पर हो खड़े यूँ मुख मोड़ कर।

थोड़ी नाराजगी तुम दो ना सजा,
बातें मन की बता तू दिल खोलकर।

जीना दुश्वार हुआ बिन तेरे सनम,
जल्दी जल्दी चले आओ दौड़ कर।

~~~~ सुनिल #शांडिल्य 

#highlights

Saturday, February 24, 2024

उलझे हैं केश जैसे नागिनों का जाल कोई
तिरछी नज़र ये कटार लगने लगी।।

अधरों की लालिमा लजाये सूर्य का प्रताप
झुमके की आभा अनवार लगने लगी।।

दूधिया सा चाँद ढोये जैसे सुरमई साँझ
ओढ़नी भी तन को कहार लगने लगी।।

प्रीत की पड़ी फुहार चढ़ने लगा ख़ुमार
प्रियतमा भी रति-अवतार लगने लगी।।

~~~~ सुनिल #शांडिल्य

Sunday, February 18, 2024

दिल में समन्दर सा तुफान लिए
कुछ स्मृतियों के धुन गुनगुना रही

किरणों ने बिखेरा है साज अनहद
सुर लहरी बन तरंगें झिलमिला रही

वक़्त से पहले वक्त का तकाजा था,कि
आसाध्य सांझ की बेला तुझे बुला रही

उठ रहीं लहरें कुछ इस तरह कि मानो
वादियों को भी मचलना सिखा रहीं

उड़ चला मन का पंछी भी अब तो
दिल के टहनियों पर, कुछ ठौर पा रही,

बिठा कर यादों की कश्ती में हमें
"शांडिल्य" पूरी दुनिया की सैर करा रही

~~~~ सुनिल #शांडिल्य