Tuesday, September 24, 2024

देखते ही तुमको मेरा दिल खो रहा हैं
लगता है मुझको तुमसे प्यार हो रहा हैं

किताबो में देखु तो पढ़ता हूँ तुझको
लिखने जो बैठू तो लिखता हूँ तुझको

दीवानो के जैसा मेरा हाल हो रहा हैं
लगता हैं मुझको तुमसे प्यार हो रहा हैं

तेरे आने से लगता हैं दिल धडकता हैं
तेरे हसने से लगता हैं सारी ख़ुशी मिल गयी हैं

~~~~ सुनिल #शांडिल्य

Sunday, September 22, 2024

वो सिंदूरी संध्या 
और साथ तेरा

नदी के इस छोर मैं 
उस पार तेरा बसेरा

रवि की डूबती किरणें 
ह्रदयँ में इश्क़ का सवेरा

जल में तैरती नईया 
लहरें करें मिलन तेरा-मेरा

मिलें राहत ऐसी शाम में
चाँद जलें देख इश्क़ मेरा

~~~~ सुनिल #शांडिल्य

Friday, September 13, 2024

चाँद छिपता रहा चाँदनी रात थी
बादलों की वो कोई ख़ुराफ़ात थी.

मौत ने आके घेरा हमें जिस जगह
ज़िन्दगी की वहीं से शुरूआत थी.

मौज़-ए-दरिया ने धोखा दिया पेशतर
वर्ना तूफ़ान क्या तेरी औक़ात थी.

बाद मुद्दत के आई फ़ना हो गई
यूँ ख़ुशी से अधूरी मुलाक़ात थी.

~~~~ सुनिल #शांडिल्य

Tuesday, September 10, 2024

मैं पतझड़ की अवहेलना‌ कभी नहीं कर पाऊंगा,
बसंत ऋतु के आगमन पे ना मैं कभी इतराऊंगा

अगर पतझड़ ने पुराने पत्ते नहीं गिराए होते,
तो क्या बसंत ऋतु में, नए पत्तों का सृजन हो पाता ?

दुख-सुख की परिभाषाएं कुछ ऐसे ही बना करती है,
दुख के बाद की खुशियां अतुलनीय सी लगती है।

~~~~ सुनिल #शांडिल्य

Sunday, September 8, 2024

छंद लिखना चाह रहे थे, बंद में उलझ गये।
चेतना के बोल सारे, रेत से फिसल गये।।

भाव, भावना सभी, रित गईं जाने कहाँ।
और हम निष्पन्द से, अवसाद में उलझ गये।।

तुमने कही मैंने सुनी, मैंने कही तुमने सुनी।
बात बात में बढ़ी और, फासले निकल गये।।

~~~~ सुनिल #शांडिल्य

Wednesday, September 4, 2024

वो निकल पड़ी है पर्वत से,कुछ चंचलसी कुछ निर्मलसी
सागर से मिलने की आस लिए,वो सूखी धरा भिगोती है

कभी वीररस का उन्माद लिए,कभी श्रृंगारों के सावन में
विरह गीतके बीहड़ में, वो तन्हाई में रोती है

बेचैनी के मरुस्थल में, रेतों का तूफ़ान लिए
एक अनबुझी प्यास है, अश्कों से लबको भिगोती है

~~~~ सुनिल शांडिल्य

Monday, September 2, 2024

धरा धुरी पै घूमकर प्रथा अटल निभा गयी
भानु पथ बदल चला उषा नवल सी आ गयी

शिशिर का प्रशीत कंप हो रहा विरल यथा
आग में अलाव की ताप भी हुआ वृथा

रश्मियां प्रखर हुयीं धूप खिलखिला उठी
हरी-भरी हुयी मही फसल लहलहा उठी

कनक बालियाँ निकल खेत खेत गा रहीं
काश्तकार को सुखद स्वप्न सा दिखा रहीं

~~~~ सुनिल #शांडिल्य