Thursday, April 9, 2015

कुछ और न कही जाये,कुछ और न सुनी जाये
जो बात है जहा,बस अब वही तक रखी जाये
न हो अदावत किसी से,न दोस्ती की उम्मीद
कहा जाती है फ़िर जिंदगी,ये बस देखी जाये

Wednesday, April 8, 2015

न हटाइयें चिल्मन,दिल पे इख्तियार नही है
अब और कोई आपसा,यहाँ पे सरकार नही है

कबसे जलाये बैठे हो शम्मा,तुम सनमखाने की
कहोगे कैसे तुम्हे भी किसीका,इंतजार नही है

लिपटी है जुल्फ से कलिया,गर्म रुखसारो की
उन्हें भी शायद मुझपे,इतना ऐतबार नही है

शोर क्यों उठ रहा है यहाँ,तुम्हारी धडकनों का
अब न कहना के दिल तुम्हारा बेकरार नही है

हर अदा को तुम्हारी देख चुके है यहाँ
परदा तो आख़िर परदा है,कोई दीवार नही है

दो बूंद चैन की नही मिलती,दुनिया के मैखाने में
किन किन गलियों से गुजर चुका हूँ,मैं अन्जाने में

गैरो से शिकवा कैसा,दुसरो से शिकायत कैसी
आख़िर अपने ही लगे है जब,मुझको मिटाने में

जिनकी खातिर गुजरी है,अब तक ये मेरी जिंदगी
झिझक क्यों होती है उन्हे,अब मेरा साथ निभाने में

कैसे बस पायेगी ये बस्तिया,अपने अरमानो की
तकदीर ख़ुद रहती है मसरूफ,इनको जलाने में

इतना उब चुका हु ए दोस्त, दुनिया की तंगदिली से
तुम भी देर क्यों करते हो खुदा,मुझे यहाँ से उठाने में

टूटे से दिल पे क्या असर,शाद ओ नाशाद का
इन टुकडो में कैसा बसर,आख़िर जज्बात का

रंग ज़माने के देख लिए,और देखने को रहा क्या
बुझी सी जिंदगी को क्या फर्क, नूर ओ जुल्मात का

मिजाज पुर्सी करता है कोई,तो वो है अच्छाई उसकी
वरना क्या अफसाना करू बयाँ,मैं बिगड़ते हालात का

टूटी तकदीर रंज-ओ-गम तनहाई और अफ़सोस
कैसे शुक्रिया अदा करू,जिंदगी की इस सौगात का

''
शायद और न रोये,लेकिन मुस्कुरा भी न पाएंगे
खामोशी में बस गुजारते जायेंगे,वक्त अपने हयात का

तेरी खामोशियों ने एक शोर मचाके रखा है
कैसी मजबूरियों का जाल बिछाके रखा है

किस्मत थी अपनी,जो गये हम दोनों जहा से
जहा न रुकना था मुझे,वही पे बिठा के रखा है

है कसूर तेरा,नजर आता नही धुवाँ तुझको
वरना तेरे सामने दिल हमने जलाके रखा है

खिले गुंचे वही,खाक हुवी थी जहा अपनी हस्ती
शगूफा उन्ही गुलो का,तेरी राह में सजाके रखा है

जानते है पास आ के तुम कहोगे कभी
जिस राज-ऐ-दिल को तुमने छुपा के रखा है

Monday, April 6, 2015

कुछ रोज गुजारने की खातिर,एक आशियाना ढूंढ़ लिया
ता-उम्र होश में न आ सकू,ऐसा एक मयखाना ढूंढ़ लिया

क्या मालूम था मुझे,के होगी झूठी वो महफिले अपनी
अब आयी अक्ल,के जीने की खातिर वीराना ढूंढ़ लिया

पूछेगा गर खुदा मुझको,लाये क्या हो उस जहा से तुम
कर दूंगा नजर ये दिल टुटा,ऐसा एक नजराना ढूंढ़ लिया

मिलती नही जो इस दुनिया में,एक पहचान अब मुझको
अक्स जो देखा शीशे में अपना,के कोई बेगाना ढूंढ़ लिया

अपनी सूरत-ऐ-हाल पे हसता है ये सारा जमाना
हम भी समझेंगे के लोगो ने,हसने का बहाना ढूंढ़ लिया

जो आग थी सीने में,उसका नाम कुछ और था
कल तक उनकी निगाहों का,पैगाम कुछ और था

दुखता था कभी ये दिल,तो सम्हाल लेते थे वो
दर्द भूल जाने का वो इन्तेजाम कुछ और था

सितम भी आसां बन जाते थे,पहलु में उनके
उस दामन की खुशबू का निजाम कुछ और था

मुकम्मल होता सफर,जो तेरे दर तक आ जाते
पोहचे मगर जहा तक वो मकाम कुछ और था

क्या से क्या हो गया है तेरे अफ़साने का ए दोस्त 
जो सोचा था तुने वो शायद अंजाम कुछ और था