Sunday, December 29, 2024

रूप-यौवन, मदन वेग छाया हुआ
दूध-केशर से मल-मल नहाया हुआ।

ये बदन भीगा बरखा में,लगता है यूँ।
खूब फ़ुरसत में रब का बनाया हुआ।

ये कमल पांखुरी तन,सरिता-कटि,
दृष्टि उतराये ,गहरी लगे घाटियाँ ।

कहीं मैले न हो,पाँव छू कर ज़मीं,
मरमरी-बाँहों में 'गर,घिरे वादियाँ ।।

~~~~ सुनिल #शांडिल्य

No comments:

Post a Comment