रूप-यौवन, मदन वेग छाया हुआ
दूध-केशर से मल-मल नहाया हुआ।
ये बदन भीगा बरखा में,लगता है यूँ।
खूब फ़ुरसत में रब का बनाया हुआ।
ये कमल पांखुरी तन,सरिता-कटि,
दृष्टि उतराये ,गहरी लगे घाटियाँ ।
कहीं मैले न हो,पाँव छू कर ज़मीं,
मरमरी-बाँहों में 'गर,घिरे वादियाँ ।।
~~~~ सुनिल #शांडिल्य
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