जाम लिए साकी का इंतजार था।
ढलने दो सुरमई शाम को अब
रात में मोहब्बत का इजहार था।
कह न पाये हम अपनी हसरतें,
आज खामोशी लिए इकरार था।
डसता है अकेलापन विष लिए
तेरा गुस्सा ही मेरा एतबार था।
मोहब्बत में भरोसा करना फिजूल,
तड़पती आरज़ू का एक करार था।
~~~~ सुनिल #शांडिल्य
No comments:
Post a Comment