Friday, February 14, 2025

तेरी याद में ज़रा आँखें भिगो लूँ
उदास रात की तन्हाई में सो लूँ

अकेले ग़म का बोझ अब संभलता नहीं
अगर तू मिल जाये तो तुझसे लिपट कर रो लूँ

आंसुओं की बूँदें हैं या आँखों की नमी है
न ऊपर आसमां है न नीचे ज़मी है

यह कैसा मोड़ है ज़िन्दगी का
उसी की ज़रूरत है और उसी की कमी है

~~~~ सुनिल #शांडिल्य

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