पीली चुनर सिर पर ओढे देखो वो मुस्कुराई
सखियों के संग करने ठिठोली बागों में वो आई
लहर लहर लहराए सरसों देख हवा शर्माए
देखो देखो ऋतुराज बसंत ऋतु ये आई
देखके अंबर भी मानों अब लेता इनकी बलाई
हरियाली से बिखरी धरा पर खुश्बू है महकाई
मानों धरा के यौवन ने ली फिर से है अंगड़ाई
#शांडिल्य
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