जीवन के कुछ अनमोल पल पन्नों के अंदर थे बंद
लिखे हुए तुम्हारे वह छंद लगे मुझे जैसे मकरंद
पोर-पोर झंकृत किया उस बिसरी हुई बात ने
मन मेरा अलंकृत किया स्मृतियों के मलय बहार ने
उन दिनों को ढूंढता हूं मै हरदम ख्वाबों खयालों में
सागर सा था शांत मैं और निर्झर सी चंचल तुम
लिखने बैठूं तेरे बारे में शब्द कम पड़ जाते हैं
कुछ समझ नहीं आता क्यों अधर मौन हो जाते हैं।
बांधे रखा है मुझे तुमसे उन स्मृतियों के भंवर जाल ने
सुवासित मुझको कर दिया स्मृतियों के मलय बयार ने।
#शांडिल्य
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