Thursday, June 4, 2015

मोहब्बत से इनायत से वफ़ा से चोट लगती है
बिखरता फूल हूँ मुझको हवा से चोट लगती है

मैं शबनम की ज़बान से , फूल की आवाज़ सुनाता हूँ
अजीब एहसास है अपनी सदा से चोट लगती है

मेरी आँखों मैं आंसू की तरह इक रात आ जाओ
तकल्लुफ़ से बनावट से अदा से चोट लगती है

तुझे खुद अपनी मजबूरी का अंदाजा नहीं शायाद
ना कर अहेद -ए -वफ़ा अहेद -ए -वफ़ा से चोट लगती है ..

द्वारा-फिरोज अल्लापुर



Tuesday, June 2, 2015

इस दर्दे दिल को ज़माना क्या जाने ,
कोई बेवफा इश्क निभाना क्या जाने |
कब्र के उंदर होता है कितना दर्द 
ये ऊपर फूल चढाने वाला क्या जाने ||


जिस शाम मेरे लब पर तेरा नाम ना आये ,
खुदा करे ऐसी शाम ना आये ….

ये जाने वफ़ा , ये कभी मुमकिन ही नहीं ,
अफसाना लिख् और तेरा नाम ना आये ….

मंजिले भी उसकी थी , रास्ता भी उसका था .
एक मैं अकेला था , काफिला भी उसका था ..

साथ -साथ चलने की सोच भी उसकी थी ,
फिर रास्ता बदलने का फैसला भी उसका था …

आज क्यों अकेला हूँ , दिल सवाल करता है ,
लोग तो उसके थे , क्या खुदा भी उसका था … .?

Monday, June 1, 2015

नज़रें न होती तो नज़ारा न होता ,
दुनिया मैं हसीनो का गुज़ारा न होता ,
हमसे यह मत कहो के दिल लगाना छोड़ दे ,
जाके खुदा से कहो के हसीनो को बनाना छोड़ दे

तेरी किताब – इ – हयात में, मेरी औकात इक सफा है,
रंगीन फसानों में दबी कहीं मेरी वफ़ा है.

शिकायत उस लिखने वाले से है, तुझसे कोई गिला नहीं,
जो शायद इस कहानी में मेरे किरदार से खफा है.

किताब – इ – मुक़द्दस है मेरा प्यार, पर हार मिली,
इसमें कोई फसल ही नहीं जिसका नाम नुकसान या नफा है.

उनके दीद पर दफ्फतन निकल गया “या मेरे खुदा”
वो इसे अगर मानते हैं मेरी जफा तो मेरी जफा है.

तारीख जानता है तलवार की अज़ीयतें कलम पर,
हारी है शमशीर, कलम की फ़तेह हर दफा है.

डर के बिना ज़िन्दगी क्या …
हौसला के बिना जीना क्या …
डर तो हमे  भी है उससे दूर रहने का …
पर वोह डर ही क्या जब पास रहने को वोह इंसान ही न रहे  !!!