Wednesday, July 29, 2026

पतझड़ ने फिर शाख़ का श्रृंगार ले लिया,
मौसम ने हँसते फूलों का प्यार ले लिया।

गिरते हुए पत्तों ने इतना सिखा दिया,
हर हार ने जीने का अधिकार ले लिया।

सूनी-सी राह में भी उम्मीद चल पड़ी,
बसंत ने दिल में फिर से घर कर लिया।

कल फिर नई कोंपलें मुस्कुराएँगी यक़ीनन,
कुदरत ने हर पतझड़ में बहार भर दिया।

#शांडिल्य

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