Wednesday, May 10, 2017

इक जाम-ए-जुनूं को लबों से लगाया है
दिल को इक नये ग़म का नशा कराया है
ये कैसी हलचल मची है महफ़िल में
क्या कोई चाक जिगर महफ़िल में आया है
रो रही है रात चांद से छुपकर देखो
साज़-ए-दिल किस ख़ाकजां ने बजाया है
मत कहो किसी भी बच्चे को तुम यतीम
हर बच्चे के सर पे खुदा का साया है
दिल तारीक से तारीकतर हुआ जाता है
कैसी शम्मा है जिसे आपने जलाया है
आज तक तो कभी आवाज़ नहीं सुनी हमने
अब आपने हमें किस तौर ये बुलाया है
तीर-ए-इश्क़ की तासीर हाय क्या कहें
ज़ख़्म सीने पे उम्र भर सजाया है
मुगालते में रहे मुबालग़े के पीछे
ये समझते रहे नहीं वो पराया है
वो जाने किन हालातों से गुज़रा आने में
तुझे खुदा बना के जो तेरे दर पे आया है
लाल-ओ-जवाहर में उसको ना भुला देना
उस ही की रहमतों से ये घर सजाया है
वो सिर्फ़ महबूब है खुदा हो नहीं सकता
उसकी इबादत से तूने दिल को बहलाया है
तेरी तस्वीर है आँखों में फ़िर से नीर है आँखों में
दिल में लगता है ख़वाब है इक ताबीर है आँखों में
जिस से है दिल रेज़ा रेज़ा वो तीर है आँखों में
मेरी हालत है राँझे जैसी बस हीर है आँखों में

तेरा अक्स तेरी सूरत तेरी यादें यही जागीर है आँखों में
हश्र इश्क़ के दामन का चीर चीर है आँखों में
जिसको मौत भी नहीं मिलती वो फ़कीर है आँखों में
दिल में आंधियां चलती हैं और धीर है आँखों में


ज़ेहन में मेरे जो सवाल है उसकी तद्बीर है आँखों में
रुसवाई की हवा फ़िज़ाओं में मेरी तक्दीर है आँखों में
दिल जला उस की तस्वीर जल गई होगी
इश्क़ की आखरी तहरीर जल गई होगी
नज़र उठी तो बिजली ने भी खैर मांगी
जो झुकी तो शमशीर जल गई होगी
तूने तिनका समझ के फूँक दिया
आशियाने की तक़दीर जल गई होगी
तू जो उतरी हक़ीक़त की तरह आँखों में
हर ख्वाब की तदबीर जल गई होगी
हश्र का दिन था जब मिली थी नज़र
रुसवाइयों की तक़रीर जल गई होगी
तू मिली तो ज़िंदगी जन्नत सी हुई
मेरी ज़ीस्त-ए-ताज़ीर जल गई होगी
तेरी ज़ुल्फ़ की क़ैद को देख कर हाए
दुनिया की हर ज़ंजीर जल गई होगी
मेरे पहलू में देख कर उसको
बहुतों की ताबीर जल गई होगी
काटे हैं इन्सान ने दिल की रगों से खंजर कई
दिल की हिम्मत से सुनो झुक जाते हैं लश्कर कई
ये जो मतलबी जहान है, ये फ़ितरत-ए-इन्सान है
पेड़ पर लगते ही फल धर लेते हैं पत्थर कई
तू ड़रा सा क्यों खड़ा है देख तेरे आस पास
बेख़ौफ़ और बेफ़िक्र लेते मौत से टक्कर कई
मौत के सैलाब में बह जाता है सब खुश्क-ओ-तर
इस शय से हारे हैं यहाँ औरंग-ओ-जाबर कई
इन्सान तो इन्सान अब तो मुर्दों की भी हालत ये है
नोचते हैं हर लाश को इन्सान भी आकर कई
अँधेरों में उजाले चाहते हैं पेट भूखे निवाले चाहते हैं।
प्यास से छटपटाती रूह तन्हा साथ के पीने वाले चाहते हैं।

सर्द रातों के झेलते नश्तर गर्म मोटे दुशाले चाहते हैं।
बहुत भारी हैं दर्द के किस्से हल्के-फुल्के रिसाले चाहते हैं।

झुठ के रंग में रंगी दुनिया सच्चाई की मिसालें चाहते हैं।
बड़ी कमजोर नस्ल आई हैमौत वाले जियाले चाहते हैं।

यह तरक्की पसंद महफिल है दिल की जुबाँ पे ताले चाहते हैं।
इक-इक पत्थर जोड़ के मैंने जो दीवार बनाई है
झाँकूँ उसके पीछे तो रुस्वाई ही रुस्वाई है

यों लगता है सोते जागते औरों का मोहताज हूँ मैं
आँखें मेरी अपनी हैं पर उनमें नींद पराई है

देख रहे हैं सब हैरत से नीले-नीले पानी को
पूछे कौन समन्दर से तुझमें कितनी गहराई है

सब कहते हैं इक जन्नत उतरी है मेरी धरती पर
मैं दिल में सोचूँ शायद कमज़ोर मेरी बीनाई है

बाहर सहन में पेड़ों पर कुछ जलते-बुझते जुगनू थे
हैरत है फिर घर के अन्दर किसने आग लगाई है

आज हुआ मालूम मुझे इस शहर के चन्द सयानों से
अपनी राह बदलते रहना सबसे बड़ी दानाई है

तोड़ गये पैमाना-ए-वफ़ा इस दौर में कैसे कैसे लोग
ये मत सोच "क़तील" कि बस इक यार तेरा हरजाई है
इक समन्दर सा गिरा था मुझ में ।
फिर बहोत शोर हुआ था मुझ में ।

रास्ते सारे ही मानूस से थे
इक फ़कत मैं ही नया था मुझ में ।

ख़ाक और ख़ून में नहलाया हुआ
कब से इक शख़्स पड़ा था मुझ में ।

बर्फ़ की तह में लरज़ती हुई लाश
ऐसा मंज़र भी छुपा था मुझ में ।

था कोई मुझमें जो था मुझसे हक़ीर
और कोई मुझसे बड़ा था मुझ में ।

उसने क्यों छोड़ दिया ख़ाना-ए-दिल
नक़्श-ए-हर-लम्स हरा था मुझ में ।

मैं समझता था जिसे जान-ए-नफ़स
वो बहुत दूर खड़ा था मुझ में ।

मैं भी तस्वीर सा चस्पाँ था कहीं
सानेहा ये भी हुआ था मुझ में ।

रक़्स करते हुए तारों का हुजूम
ये ख़ज़ाना भी गड़ा था मुझ में ।

आसमाँ खौफ़ से तकता था मुझे
क्या कोई उससे बड़ा था मुझ में ।