Friday, October 17, 2025

कुछ लोग कुछ रिश्ते
हमारे हाथों में नही होते
हां हम उन्हे चाहते हैं बहुत
मगर कह नही सकते
बता नही सकते, जता नही सकते
बस अच्छा लगता है
उन्हें आसपास देखना,महसूस करना
हां मुमकिन नही होता उनसे हरबात कहना
मगर एक आस होती है कि
वो कभी मजाक में ही पूछे तो सही
कि तुझे कुछ कहना तो नही

#शांडिल्य

Wednesday, October 15, 2025

दुनिया में किसी हमसफर के बिना जिंदगी अधूरी है
कोई हमसफर पाने की आस में ही जिंदगी गुज़र गई

जब तक रहा इश्क से अंजान न निकली दर से कभी
अब नेक हमसफ़र की तलाश में ही जिंदगी गुजर गई

मेरी ख्वाहिश है उनसे मिलके दिल की बात बताऊंगा
दिल में बनते बिगड़ते,अहसास में जिंदगी गुज़र गई

#शांडिल्य

Tuesday, October 14, 2025

ना किस्से ना बाते
ना वादे ना ही मुलाकातें
कोई याद बाकी नही
कोई चाह अब आधी नही
था एक फरेब वो बस
नासमझी में उसको
खुदा बना दिया
और देखो खुदा बनकर
वो मेरी ही किस्मत मिटा गई
बस एक उम्मीद ही थी
उसे अपना बनाने की
एक रंगीन दुनिया सजाने की
जाने कैसी थी वो रात
एक झटके में सब बदल गया

#शांडिल्य

Sunday, October 12, 2025

बस यूँ ही गुज़र रहा है जो
वो सफर हूँ मैं
मंज़िल से होकर बेख़बर 
भटक रहा हूँ मैं
ग़र मुलाक़ात हो तो बताना
तलाश रहा हूँ मैं
साँसें उखड़ने लगीं हैं अब
यादें भी धुंधली पड़ने लगी हैं 
किस्मत अपनी बनाने को 
अब भी लड़ रहा हूँ मैं।

#शांडिल्य

Wednesday, October 8, 2025

रक्त सी लालिमा के मध्य
सूर्य की किरणें
जब तुम्हारे
सांवले रंग पर पड़ती है
तो यूं प्रतीत होता है
मानो
रक्त का प्रवाह
अपने चरम पर है

और उसमें
तुम्हारा ये श्रृंगार
खुले केश
रक्तिम परिधान
और
फूलों का आभूषण
 
मानो
भोर और संध्या
रंग रहे हो तुम्हे
अपने अरुण में
अपने आवरण में

#शांडिल्य

Monday, October 6, 2025

लय लोच लचकती स्वर लहरी
नीलिमा नयन में थी गहरी
सागर तट व्याकुल हुए किंतु 
लहरें कब तट पर आ ठहरीं

हैं सिंधु किनारे मौन सतत
रत्नाकर होता नहीं पृथक
पर सीप कभी मोती लेकर
तटबंधों तक ना आए चहक

श्रम साहस की जो अमरबेल
लेते वे नर दरिया उढ़ेल
और तोड़ प्रखर भंवरजाल
रत्नों से खेलें प्रबल खेल

#शांडिल्य

Saturday, October 4, 2025

नारी को जान सका कोई न
न कोई पर्वत न कोई सागर
जीवन जीती है धरती सा
मन हो जाये गागर में सागर

अगनित मोती छुपे हुये है
मनकी बहती नदिया में
है किसको फुरसत देखे जो
वक्त के बहते दरिया में

बनती माला जुड़ जुड़ मोती
ढ़ूंढ़ लाता मन डुबकी लगाकर
जीवन जीती है धरती सा
मन हुआ गागर में सागर

#शांडिल्य

Friday, October 3, 2025

राधा नाम का जादू ऐसा
हर दर्द लगे जैसे छोटा सा पैसा
कान्हा जब लेते हैं ये नाम
तो सारा ब्रह्मांड हो जाता गुलाम
राधा की चाहत कृष्ण की मस्ती
इस प्रेम में बसी है गोकुल की बस्ती
जहाँ भी इनका नाम लिया जाए
वहीं प्रेम का दरिया लहराए
ना कोई वादा ना कोई कसमें
बस प्रेम था दोनों के बस में

#शांडिल्य

Wednesday, October 1, 2025

राधा के बिना अधूरे श्याम
जैसे सूरज बिना नहीं सुबह की शाम
ये प्रेम है दुनिया से न्यारा
जहाँ कृष्ण वहाँ राधा का सहारा

बंसी की धुन पे नाचे राधा
प्रेम का रंग है सबसे ज्यादा
श्याम के संग वो जब भी आई
फिर प्रेम की बारिश छा ही गई

#शांडिल्य