कभी मधुर मुस्कान क्षणिक-सी
कभी होंठ पर कंपन होता
जैसे गहरी निद्रा में शिशु
हर क्षण अपना रूप बदलता
लाया है संदेश मिलन का
दूर क्षितिज का धुंधला कोना
दुल्हन सरीखी दिशा सिमटकर
छेड़ रही चाहों की वीणा
सीले आंगन में अंतर के
धूप आज वर्षों में छाई
प्रियतम मिलने को आते हैं
सृष्टि इसी से है खिल आई
#शांडिल्य