नैनो मे भरकर चांद के दीदार की हसरत
आसमान को एकटक निहारती वो रात
गुमसुम सी खामोश सी वो रात
ओढ़कर अंधेरे की स्याह,चादर
चाँद का इन्तजार करती वो रात
गुमसुम सी खामोश सी वो रात
बावरी है निरी पगली है
शायद नही पता उसे ये बात
रोज रोज कब होती है
पूर्णिमाकी चाँद रात,,
झेलना पडता है चाँद
और रात को भी विरह का ताप
खलनायक की तरह जब मध्य
आ जाती है अमावसकी स्याह रात
वो रात खामोश सी वो रात
करती है सारी रात चाँद का इन्तजार
चाहे चाँद आये या ना आये
उसे तो रहता है बस चादॅ का इन्तजार
जाने कितनी सदियो से झेलते आ रहे है
दोनो विरह का संताप मानो नियति है
इन दोनो की या है कोई श्राप.....
वो रात खामोश सी वो रात .....
#शांडिल्य